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  प्रिय बहनों स्मरण के आकाश में भटकते हुए खरोचों के निशान आज मुझे दिखाई दे रहे हैं | मैंने इन्हें कभी नहीं देखा था | शब्द टूट गए थे , मन कहीं डोल गया था | अतीत के गर्त में समाया हुआ काल क्या फिर से प्रत्यावर्तन कर रहा है इतिहास के खाली पृष्ठों पर | चलने की आहट आज मुझे सुनाई दे रही है | इस सुनसान बिस्तर पर कौन हूँ मैं ? एक अतीत ? अथवा एक वर्तमान जो एक सेतु बन कर खड़ा है , इस छूटे विगत के बीच   चलते रहो मुक्त होकर चलते रहो , यह सेतु मुझे जोड़ देगा ओह ! मेरी गति आज मुझे अपनी परछाई भी स्वीकार नहीं है         प्रिय परिजन अब मुझे सोने दो, चलो, देर रात हो गई है पक्षी सब घोंसलों में घुस चुके है | पथचारी भी अपने अपने गृहों में लौट चुके हैं | लेकिन कुछ निशाचर अभी डोल रहे हैं सड़कों पर कुछ उद्याम सपने संजोये |   कुछ ने फुटपाथ पर अपना आस्थाना बना लिया है धरती के आँगन में और मै   इस आलीशान बिस्तर पर कुछ अपरिचित   कवच में बद्ध   ओ! मेरे मन वहन करो पीड़ा सहन करो अपरिसीम व...
  बहन और कॉलेज का एडमिशन खिड़की के पीछे से एक छाया दिखाई दे रही थी | खिड़की से ही सटा हुआ था ताई और ताऊजी का कमरा | किसकी छाया ? तनाव में तो हम सभी बहनें थी क्योंकि आज कॉलेज एडमिशन का अंतिम दिन था | बड़ी बहन का एडमिशन अभी तक नहीं हुआ था | उनका मन अंकगणित पढने का था, पर तब तक अंकगणित की सारी   सीटें भर चुकी थी | गणित में आनर्स पढ़ने की तो अब कोई उम्मीद नहीं रही | आज अंतिम दिन था बाकी   विषयों में एडमिशन का, जहाँ कुछ सीटें अभी भी खाली थी | पिताजी ने कहा , देखो हम इंतजाम करते है जिस विषय में   मिले उसी में एडमिशन ले लेना, कम से कम पढाई तो चालू रहे | लेकिन कैसे ? सुबह का ११ बज गया अभी तक पैसे का कोई इंतजाम नहीं हुआ था | इसी तनाव में बहन खिड़की के पास बरांडे में खड़ी थी   | निराश होकर उम्मीद छोड़ चुकी थी | रोने की इच्छा हो रही थी , पर रोये भी तो कैसे ? पिताजी कोशिश तो कर ही रहे थे | वैसे भी बहन का   स्वभाव प्रतिवादी नहीं था , जो हो रहा था उसी को वे स्वीकार कर लेती थी| अंत में कोई उपाय न देख कर पिताजी ने ताऊजी से धीरे से कहा , “ उमा के एडमिशन के लिए ११ रुपये फीस के ...
  बड़ी बहन और हमारा बार्षिकोत्सव   हम अपनी बहन के नृत्य और गायन के तो वैसे ही कायल थे , और जब उन्होंने प्रस्ताव दिया कि क्यों न हम लोग एक प्रोग्राम का आयोजन करे जिसमे हम सभी बहने अंश ग्रहण करेगी किन्तु हमारे मास्टरजी का पार्ट खुद उनके ही हाथ में रहेगा |और   क्यों न होता उन्ही को नृत्य , गान,   नाटक वगैरह वगैरह सब आता था | हम लोग उनके प्रस्ताव से सहर्ष राजी हो गये, वह तो होना ही था |जोरशोर से हम रिहर्सल में लग   गए | वो हमें गाना नाच नाटक का अभ्यास तो रोज शाम को करवाती ही थी, उसके साथ कभी कभी लोजेंस का लोभ दिखा कर कुछ अतिरिक्त समय रिहर्सल   भी करवा लेती थी | वह सब हम छोटी बहने ख़ुशी ख़ुशी करते थे क्योकि स्कूल के उत्सव में हम अपनी आर्थिक तंगी के कारण भाग नहीं ले पाते थे, इसलिए अपनी मन की आस मिटने का यह सबसे अच्छा तरीका था | स्कूल में कई बार चयन होने के पश्चात् हम भाग नहीं ले पाते   थे उसका कारण था हमारे पास ड्रेस सिलवाने के पैसे नहीं होते थे |   जो भी हो   १५ से २० दिन तक हमारा रिहर्सल   चलता था , फिर बाकायदा निश्चित दिन आने के पहले ...
  बड़ी बहन और कबीर, तुलसी, सूर, मीरा “रस गगन में गुफा ऽ    ऽ    ऽ   ऽ   में अजर झरे , रस गगन में गुफा ऽ    ऽ    ऽ   ऽ   में अजर झरे”   मन को झकझोर देनेवाले कबीरदासजी की वाणी और बहन का सुर एक अजीबोगरीब प्रश्न सामने खड़ा कर देता ---कौन सा रस, कैसा रस ? रस की गुफा ? कहाँ ?   फिर भी उनकी आवाज का रस जादू हम पर जाता था और हम फटी आवाज में उनके साथ   गाने के लिए मजबूर हो जाते | वह फिर तान छेडती, “पायोजी मैंने राम    ऽ    ऽ   ऽ रतन ऽ   ऽ   ऽधन पायो” —उनका यह ‘रतन-धन’ शायद कोई कभी नहीं समझ सका |   कभी वह गा उठती ,   “भज मन राम चरण सुख दाई...जिन चरणों ....से निकल सुरसरि....शंकर जटा समाई ....” उनका ‘राम-चरण’ बस यही गीत संगीत था , जिसके पीछे-पीछे   हम सभी बहने नक़ल करके गाया करते थे| इसलिए आज भी उनके शब्द जेहन में बस उतरे हुए है, लेकिन गाने की   सामर्थ्य हममें से किसी में भी नहीं है   |उनके पास   एक सिंगल रीड का हारमोनियम था जिसे पिताजी ने बड़ी कसौटी से उनक...
बड़ी बहन और कहानी का पिटारा ·          कहाँ तुम्हारा घर है बेटी, किस कुल की तुम रानी            किस माँ के नयनो की पुतली, पिता कौन है सानी ... ·          पाला पोसा मुझे चील ने मेरी है वह माता           मुझे पिता का नाम जानने दिया न कोई दाता          पेड़ों पर मै पली सदा ही रही नगर से दूर         सौदागर है मेरे स्वामी जो है भारी सूद | एक सुरीली और धीमी आवाज हमें सुनाई देती और हम दौड़ते हुए आते   और चिल्लाना शुरू कर देते, ‘चील मैया, चील मैया   और....चील मैया ही सुनेगे, बस ...बस... और कुछ नहीं बस... चील मैया   ही सुनेगे |’   “दिन नहीं रात नहीं –-जब देखो चील मैया, आज दूसरी कहानी सुनो,   ‘दुखिया-सुखिया की’, या ‘सात बहुओं वाली’--   जिसमे एक बंदरिया बहू भी थी’, या   ‘कहतें ऊपर दाल गई तो मै चभ्भू क्...
बड़ी बहन और बंदरुआ १४ अप्रैल को पहला बैशाख का दिन हमारे लिए बहुत इंतजार का दिन होता था क्योकि उस दिन बहुत बड़ा चडक मेला छातूबाबू बाज़ार के पास लगता था   और हम सभी बहने मेला देखने जाते थे और तरह तरह के मिटटी के खिलोने अपनी अपनी पसंद के खरीद के लाते थे – तोता –मैना की जोडी, कबूतरो के जोडे, मिटटी के फल वगैरह वगैरह |वहां से खरीदी हुई एक नटराज की मूर्ति आज   भी हमारे घर में शोभायमान है | लेकिन इस बार हम लोग लाये मिटटी के चूल्हा-चक्की, बर्तन ,कढाई, कलछी, चिमटा और भगोने, इसके साथ ही छोटा अलुमुनियम का स्टोव | अब हमने नये वर्तनो के साथ पिकनिक मनाने की सोची | हमारे यहाँ एक बड़ी अंडाकार गोल टेबल थी, जिसके नीचे बैठने की जगह थी और हममें से कोई भी उसके अन्दर घुस कर बैठ सकता था | अक्सर हम उसे छुपने के लिए व्यवहार करते थे | तो उस दिन हमने ठीक किया अज पिकनिक इसी के सामने मनायेगे | सब मिल कर जुट गए | जोर शोर से काम शुरू हो गया | थोडा मिटटी का तेल लेकर चूल्हा भी जलाया | फिर सबजी काटने का काम , आटा मला गया | सब कुछ नार्मल की तरह   चल रहा था | व्यस्तता इतनी की बात करने की   भी फुरसत नही...
बड़ी बहन और बकसिया जैसे ही बहनजी स्कूल जाने की तैयारी करती, हमारी फारमाँईशो का पुलिंदा उनके सामने खुल जाता | “बहनजी – जानवर वाला, बिस्कुट, टाफी, कम्पट” —जोर जोर से चिल्ला चिल्ला कर अपनी फरमाईशे   पेश करते थे | हालाँकि हम छोटी   बहने   जानते थे कि बड़ी बहन को उस समय सिर्फ़ दो आना हाथ-खर्च मिलता था| इतने से पैसे में वो हमारी इतनी डिमांड कैसे पूरी   करेगी ? छोटे होने के कारण हमें मिलता था एक आना, जो हम खा-पीकर कब का ख़त्म कर देते थे और नज़र रहती थी   उनके दो आने पर | हम तो चाहते थे वे अपने दो आने में हमारे लिए सारी दुनिया बटोर कर ले आये !!! चार छोटी बहनों की मांग पूरी करना वे शायद अपना फर्ज समझती थी |   इसलिए वे अपने दो आने का अच्छा सदुपयोग करती थी |जब वह साढ़े चार बजे के करीब स्कूल से लौटती तो हम बरांडे में खड़े होकर उनका इंतजार करते रहते थे | हमारा फ्लैट उस समय तीन   तल्ले पर था , आज की तरह नीचे तल्ले   नहीं बल्कि काफी ऊँचा था और हम तालियाँ बजा बजा कर उनके आगमन की सूचना घर भर को दे दिया करते थे | ये छुटंकी बहन किसी कारणवश यदि   वहां नहीं होती तो...
05.25 16:12 बड़ी बहन मैंने लिहाफ के अंदर से झांक कर देखा , पूरी आंख भी खोलने की जरूरत नहीं महसूस हुई , कंजी आंख से देखा मेरा छुट्टी का काम (स्कूल का होम बर्क) ठीक हो रहा है की नहीं । मैंने बस निश्चिंत होकर करवट बदली और सो गई । सुबह चार बजे तक कभी सुलेख , कभी लंगड़ी भिन्न के सवाल सब कुछ पूरा करके मेरी बड़ी बहन सोने गई । कितनी देर सो पाई होगी ? सिर्फ डेढ घंटा । फिर उठ कर यूं घर गृहस्थी के काम में लग गई , जैसे यह कोई खास बात न हो । सिर्फ मेरा ही नहीं , मेरी बाकी बहनों का काम वह इसी तरह रात भर निपटाती रहती थी , मानो हमने उन्हें ठेका दिया हो काम करने का । हम सुबह उठ कर रोबदार आवाज़ में पूछते , " काम हो गया, बहनजी   ?" वह हंस कर जवाब देती , " देखो , कुछ बाकी है , पंद्रह सुलेखे हुई है , आज रात भर में हो जाएगा " उन्होंने ऐसे जवाव दिया अलबत्ता उन्होंने कोई बड़ा अपराध किया हो | हम भी धौंस दिखाते , " आज हो जाना चाहिए , अभी तो गणित का काम भी बाकी है , कब होगा ? " वह उसी तरह इत्मीनान से उत्तर देती ," डरो मत , स्कूल खुलने के पहले सब हो जाएगा" हम...
पानी के पालनहारे प्रियंकर पालीवाल पानी पालनहार है वे पानी के पालनहारे थे जल और मनुष्य के पुरातन रिश्ते का महत्व जानते थे वे वे जानते थे सागर से बिछुड़ी बूंद की भटकन नदी से बिछड़े नीर की हौलनाक दास्तान वे ठीक-ठीक समझ पाते थे बादल और बूंद के रिश्ते को पानी और मिट्टी से बिछोह का दर्द उन्हें बेचैन किए रहता था मिट्टी उन्हें पहचानती थी और वे मिट्टी को वे हाड़तोड़ मेहनत करने वाले किसान थे सिल्क रूट पर काफिले लेकर चलते हुए अपने समय के सम्मान्य सार्थपति-सार्थवान थे सैनिकों की भांति वे खेल सकते थे रण-कौशल चमका सकते थे युद्ध में तलवार नियम-निष्ठा में उन्होंने द्विजत्व के मानदण्डों को किया था अंगीकार वे ही थे जिन्होंने जाति-श्रेष्ठता की ऊर्ध्वाधर मान्यताओं को कर दिया था अस्वीकार अनुक्रम में नहीं , उनका भरोसा अनुग्रह और अनुराग में था श्रम-उद्यम नवाचार में था , न्यायपूर्ण वितरण और सतत विकास में था   मरुदेस के उर्वर खड़ीनों में बिखरा है उनके श्रम-उद्यम और स्वावलम्बन का उजास जालिम सालिम के सिपहसालार भी दुहराते रहे   उनके पानीदार होने की दास्ता...